Reg No. - CHHBIL/2010/41479ISSN - 2582-919X
पत्रकारिता का दर्द— कुमार बहुखंडी

पत्रकारिता में दर्द भी है और मजा भी। फर्क सिर्फ इतना है कि मजा अक्सर दूसरों को दिखाई देता है और दर्द पत्रकार के हिस्से में आता है।
किसी कार्यक्रम में पत्रकार को आगे की कुर्सी मिल गई, किसी बड़े आदमी से हाथ मिलाते हुए फोटो खिंच गई या किसी पांच सितारा होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भोजन मिल गया, तो बाहर वाले को लगता है—वाह! क्या पेशा है।
पत्रकार अपनी जेब टटोलकर सोचता है—काश, जेब को भी ऐसा ही लगता।
मुझे पत्रकारिता के इस दर्द का असली अहसास तब हुआ जब घर में मेरी शादी की बात चलनी शुरू हुई।
एक लड़की के पिता ने मेरी मां से पूछा—
“लड़का करता क्या है?”
मां ने गर्व से कहा—
“पत्रकार है।”
उधर से तत्काल जवाब आया—
“हम उसके शौक नहीं पूछ रहे हैं। यह बताइए कि वह कमाता कितना है? आखिर हमारी बेटी को आराम से भी तो रहना है।”
मेरी मां के लिए यह जवाब किसी हमले से कम नहीं था और मेरे लिए ज्ञानवर्धक था। उस दिन पहली बार पता चला कि जिसे मैं अपना पेशा मानकर दिन-रात कर रहा हूं, समाज का एक हिस्सा उसे मेरे शौक की सूची में डाल चुका है।
पत्रकारिता में समय का कोई हिसाब नहीं। दूसरे लोग आठ घंटे की नौकरी करके घर लौट आते हैं। पत्रकार घर लौटकर भी पत्रकार ही रहता है। कोई घटना हो जाए, फोन आ जाए, प्रेस कॉन्फ्रेंस हो, कोई बयान आ जाए—आपकी छुट्टी खत्म।
लेकिन लड़की वालों के हिसाब से यह सब शौक था।
मां को धीरे-धीरे मेरे पेशे से शिकायत रहने लगी। उन्हें पत्रकारिता से कोई वैचारिक विरोध नहीं था। उनकी समस्या बहुत सीधी थी—इससे घर कैसे चलेगा और शादी कैसे होगी?
उनका तर्क भी अपनी जगह ठीक था। विचारों से राशन नहीं आता और प्रेस कार्ड दिखाकर कोई लड़की वाला अपनी बेटी नहीं देता।
आखिर एक परिचित की सहायता से मैंने भी तय किया कि कोई ऐसी नौकरी तलाश की जाए जिसे बताते ही सामने वाला दूसरा सवाल न करे—“अच्छा, लेकिन करते क्या हो?”
तलाश मुझे एक कस्टमर केयर कम्पनी के कार्यालय तक ले गई।
मैं इंटरव्यू देने पहुंचा।
पत्रकार होने के कारण आत्मविश्वास की कमी नहीं थी। रोज लोगों से सवाल करता था, जवाब सुनता था, कभी जवाब न मिले तो दोबारा सवाल करता था। मुझे लगा कस्टमर केयर में इससे ज्यादा क्या करना होगा?
इंटरव्यू शुरू हुआ।
सबसे पहले समझाया गया—
“हमारे लिए कस्टमर की संतुष्टि सबसे महत्वपूर्ण है।”
मैंने सोचा—बहुत अच्छी बात है। पत्रकारिता में पाठक महत्वपूर्ण है, यहां ग्राहक। बात लगभग एक जैसी ही हुई।
लेकिन आगे बताया गया कि ग्राहक को हर हालत में संतुष्ट रखना है। जरूरत पड़े तो बात को थोड़ा इधर-उधर घुमाइए, ऐसा जवाब दीजिए जिससे वह खुश रहे। ग्राहक नाराज नहीं होना चाहिए।
यहां मेरे भीतर का पत्रकार थोड़ा असहज हुआ।
मैंने पत्रकारिता में सीखा था कि सामने वाला नाराज हो या खुश, जो सच है उसे जानने की कोशिश करो। यहां शायद सच से ज्यादा जरूरी था कि ग्राहक फोन रखते समय खुश हो।
मैंने सोचा—चलो, नौकरी है। हर पेशे के अपने नियम होते हैं।
फिर कम्पनी के नियम बताए गए।
पहला नियम था—
“बॉस हमेशा सही होता है।”
मैंने स्वीकार कर लिया। आखिर नौकरी चाहिए थी और बॉस सामने बैठा था। ऐसे समय में बॉस के गलत होने की संभावना वैसे भी बहुत कम होती है।
फिर छुट्टी की बात आई।
मुझे बताया गया—
“आप छुट्टी तभी ले सकते हैं जब आप मरने वाले हों।”
मैं थोड़ा चौंका, लेकिन असली बात अभी बाकी थी।
“और वह भी हमें एडवांस में बताना होगा, ताकि हम आपकी जगह किसी ऐसे व्यक्ति को रख सकें जिसे आप अपना काम सिखाकर मरें। इससे कम्पनी को नये व्यक्ति को ट्रेनिंग देने में न समय खर्च करना पड़े और न पैसा।”
अब तक मैं नौकरी का इंटरव्यू दे रहा था। यहां आकर जीवन और मृत्यु की योजना बनाने लगा।
मरना तो ठीक है, लेकिन मरने की तारीख एडवांस में कैसे बताऊं?
और जिसे अपनी जगह रखा जाएगा, उसे काम कितने दिन में सिखाना होगा? यह भी तो इस बात पर निर्भर करेगा कि मेरे पास मरने से पहले कितने दिन बचे हैं।
मन में एक और डर आया—अगर मौत अचानक आ गई और मैं नये आदमी को पूरा काम सिखाए बिना मर गया तो?
कहीं कम्पनी इसे गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार न मान ले!
मैं अभी मृत्यु और ट्रेनिंग के बीच तालमेल बैठा ही रहा था कि अगला नियम सामने आ गया।
यदि कभी आपको लगे कि बॉस गलत है तो क्या करना चाहिए?
उत्तर बड़ा सरल था—
वह नियम फिर पढ़िए जिसमें लिखा है—
“बॉस हमेशा सही होता है।”
यानी समस्या का समाधान हो चुका था।
बॉस सही है।
अगर आपको लगता है कि बॉस गलत है, तो आप गलत हैं।
और यदि इसके बाद भी कोई भ्रम हो तो पहला नियम फिर पढ़ लीजिए।
अब मुझे अपनी पत्रकारिता कुछ ज्यादा अच्छी लगने लगी थी।
जिस पेशे को लड़की के पिता ने मेरा शौक समझ लिया था, उसमें कम-से-कम मुझे यह सुविधा तो थी कि गलत बात को गलत समझ सकूं।
इंटरव्यू आगे बढ़ता रहा, लेकिन मेरे भीतर दूसरा इंटरव्यू शुरू हो चुका था। सवाल कम्पनी मुझसे कर रही थी और जवाब मैं अपने आप को दे रहा था।
क्या केवल ज्यादा वेतन पाने के लिए मैं ऐसा काम कर पाऊंगा जिसमें ग्राहक को खुश रखने के लिए बात को सच से ज्यादा सुविधाजनक बनाना पड़े?
क्या नौकरी बचाने के लिए हर बार यह मान सकूंगा कि बॉस हमेशा सही है?
और क्या अच्छी नौकरी का मतलब केवल अच्छी तनख्वाह है?
मुझे मां की चिंता याद आई। लड़की के पिता का सवाल भी याद आया।
वे गलत भी नहीं थे। हर पिता चाहता है कि उसकी बेटी ऐसे घर में जाए जहां उसे आर्थिक परेशानी न हो। हर मां चाहती है कि उसका बेटा व्यवस्थित जीवन जिए।
लेकिन शायद जीवन का हिसाब केवल वेतन की पर्ची से नहीं होता।
पेट की अपनी जरूरतें हैं और आत्मा की अपनी।
उस कार्यालय में बैठकर मुझे पहली बार लगा कि पत्रकारिता ने भले मेरी जेब को बहुत समृद्ध न किया हो, लेकिन उसने मेरे भीतर सवाल पूछने की आदत जरूर डाल दी थी।
और सवाल पूछने वाला आदमी “बॉस हमेशा सही होता है” पढ़कर कुछ देर तो चुप रह सकता है, हमेशा के लिए मान ले—यह थोड़ा मुश्किल है।
बात आखिर मेरे जमीर तक पहुंच गई।
अच्छी तनख्वाह चाहिए थी। शादी भी करनी थी। मां को भी खुश देखना था।
लेकिन इसके लिए अपने भीतर बैठे पत्रकार को नौकरी से निकालना मंजूर नहीं था।
मैं इंटरव्यू देने गया था ताकि पत्रकारिता छोड़कर कोई “ढंग की नौकरी” कर सकूं।
वहां से निकला तो पत्रकारिता कुछ ज्यादा ही ढंग की लगने लगी।
अब लड़की मिले या न मिले, लड़की के पिता मुझे बेरोजगार समझें या शौकीन—कम-से-कम मुझे पता था कि मैं क्या करता हूं।
मैं पत्रकार हूं।
रही छुट्टी की बात—
मरने से पहले किसे अपना काम सिखाकर जाऊंगा, यह आज तक तय नहीं कर पाया हूं।
इसलिए फिलहाल मरने का भी कोई कार्यक्रम नहीं है।
यह लेख मूल रूप से वर्ष 1996 में मुंबई से प्रकाशित एक हिन्दी पत्रिका के लिए लिखा गया था। तीन दशक बाद उपलब्ध पुरानी प्रति और अपनी स्मृतियों के आधार पर इसे पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं। मूल प्रसंग, व्यंग्य और उस दौर की पत्रकारिता की अनुभूति को यथासंभव बरकरार रखने का प्रयास किया गया है।










