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क्या पत्रकारिता अपनी आत्मा खो रही है? लेखक : कुमार बहुखंडी

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ब्रेकिंग न्यूज़ की संस्कृति और बदलती मीडिया दुनिया पर एक पत्रकार का व्यक्तिगत चिंतन

लेखक की बात


यह कोई शोध-पत्र नहीं है। यह पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों तक काम करने, समाचारों को निकट से देखने और समय के साथ मीडिया में आए परिवर्तनों को समझने की मेरी व्यक्तिगत यात्रा का एक चिंतन है। इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह मेरे अपने हैं। यदि यह लेख पत्रकारिता के किसी विद्यार्थी, युवा पत्रकार या जागरूक पाठक को इस पेशे के मूल्यों और जिम्मेदारियों पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करता है, तो मैं अपने इस प्रयास को सार्थक मानूँगा।

क्या पत्रकारिता अपनी आत्मा खो रही है?


अक्सर कहा जाता है कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यह केवल समाचार देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने, सत्ता से प्रश्न पूछने और आम नागरिक की आवाज़ बनने का दायित्व भी निभाती है। यही कारण है कि पत्रकारिता से निष्पक्षता, ईमानदारी और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

लेकिन वर्षों तक समाचारों के बीच काम करने और मीडिया को बदलते हुए देखने के बाद मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है—क्या पत्रकारिता आज भी उसी मूल भावना के साथ आगे बढ़ रही है, या कहीं वह अपनी आत्मा खोती जा रही है?

मुझे नहीं लगता कि किसी पत्रकार की मंशा गलत होती है। अधिकांश पत्रकार कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और समाज तक सही सूचना पहुँचाने का प्रयास करते हैं। फिर भी समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप जिस गति से बदला है, उसने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

सबसे पहले खबर देने की होड़

आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा दबाव शायद यही है कि सबसे पहले खबर कौन देगा।

कभी अख़बारों के बीच प्रतिस्पर्धा होती थी। फिर समाचार चैनलों का दौर आया। उसके बाद डिजिटल मीडिया और अब सोशल मीडिया ने सूचना की गति को अभूतपूर्व बना दिया है।

आज हर सेकंड महत्वपूर्ण है। यदि कोई समाचार कुछ मिनट देर से प्रकाशित होता है, तो उसे पीछे छूट जाना माना जाता है। इसी कारण कई बार सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। खबर पहले प्रकाशित होती है और पुष्टि बाद में की जाती है।

यहीं से पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है।

एक गलत खबर केवल एक गलती नहीं होती।

गलत खबर की सबसे बड़ी कीमत

वह किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकती है, समाज में भ्रम फैला सकती है और कई बार न्याय की प्रक्रिया तक को प्रभावित कर सकती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि गलत सूचना लाखों लोगों तक पहुँच जाती है, लेकिन उसका सुधार बहुत कम लोगों तक पहुँच पाता है।

आज डिजिटल दुनिया में खबरें कुछ ही मिनटों में वायरल हो जाती हैं। लेकिन यदि बाद में वही खबर गलत साबित हो जाए, तब भी उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।

यही कारण है कि पत्रकारिता में गति से अधिक सत्यापन का महत्व होना चाहिए।

बढ़ते खंडन और बदलता विश्वास

आज लगभग प्रतिदिन किसी न किसी सार्वजनिक व्यक्ति का बयान सामने आता है—

“मैंने ऐसा नहीं कहा।”

“मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया।”

“वीडियो अधूरा है।”

“मेरा सोशल मीडिया अकाउंट हैक हो गया था।”

इनमें से कौन-सा दावा सही है और कौन-सा गलत, यह हर मामले में अलग हो सकता है।

लेकिन एक बात स्पष्ट है—

सूचना की गति, सत्यापन की गति से कहीं अधिक तेज़ हो चुकी है।

क्या पत्रकारिता केवल बाज़ार की आवश्यकता बनती जा रही है?

एक प्रश्न मुझे हमेशा परेशान करता है—

आख़िर यह तय कौन करता है कि कौन-सी खबर सबसे महत्वपूर्ण है?

क्या यह निर्णय जनहित के आधार पर लिया जाता है?

क्या यह संपादकीय विवेक से तय होता है?

या फिर यह तय होता है कि किस खबर से सबसे अधिक टीआरपी मिलेगी, सबसे अधिक क्लिक आएँगे और सबसे अधिक विज्ञापन प्राप्त होंगे?

आज अनेक ऐसे मुद्दे हैं जो आम नागरिक के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं, लेकिन वे बहुत जल्दी समाचारों से गायब हो जाते हैं।

इसके विपरीत किसी चर्चित व्यक्ति या राजनीतिक विवाद पर कई-कई दिनों तक चर्चा चलती रहती है।

मैं यह नहीं कहता कि वे समाचार महत्वपूर्ण नहीं हैं।

मेरा प्रश्न केवल इतना है कि क्या कभी-कभी समाचार का महत्व बाज़ार तय करने लगा है?

पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं है

यह भी सच है कि मीडिया संस्थानों को चलाने के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है।

समाचार-पत्रों को पाठक चाहिए।

समाचार चैनलों को दर्शक चाहिए।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को विज्ञापन और ट्रैफिक चाहिए।

इसमें कोई बुराई नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है जब व्यावसायिक हित संपादकीय निर्णयों पर प्रभाव डालने लगते हैं।

तकनीक—वरदान भी, चुनौती भी

तकनीक ने पत्रकारिता को अभूतपूर्व गति दी है।

आज किसी भी घटना की जानकारी कुछ ही सेकंड में दुनिया भर तक पहुँच जाती है।

मोबाइल फोन, लाइव स्ट्रीमिंग, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने पत्रकारिता के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है।

लेकिन तकनीक स्वयं न अच्छी होती है और न बुरी।

उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कैसे किया जाता है।

यदि पत्रकार सत्य और तथ्यों को महत्व देंगे, तो तकनीक सत्य को पहले से अधिक तेज़ी से लोगों तक पहुँचाएगी।

लेकिन यदि सनसनी को प्राथमिकता मिलेगी, तो वही तकनीक भ्रम और गलत सूचना को भी उतनी ही तेज़ी से फैलाएगी।

सबसे बड़ा संकट तकनीक नहीं, विश्वसनीयता है

मेरी दृष्टि में पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं है।

सोशल मीडिया भी नहीं।

सबसे बड़ा संकट है—विश्वसनीयता।

आज लोगों के पास पहले से कहीं अधिक जानकारी उपलब्ध है।

लेकिन विडंबना यह है कि पहले से अधिक लोग यह नहीं जानते कि किस पर भरोसा किया जाए।

यही पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

पत्रकारिता का भविष्य

मैं मानता हूँ कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सबसे पहले समाचार देना नहीं है।

उसका उद्देश्य समाज को सही, संतुलित और जिम्मेदार सूचना देना है।

एक पत्रकार से गलती हो सकती है।

गलती होना मानवीय है।

लेकिन गलती स्वीकार करना, उसे सुधारना और उससे सीखना ही सच्ची पत्रकारिता की पहचान है।

पत्रकारिता की असली ताकत कैमरा, माइक्रोफोन या आधुनिक तकनीक नहीं है।

उसकी सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है।

और एक बार यदि यह विश्वास खो गया, तो उसे वापस पाना आसान नहीं होता।

समापन


हो सकता है कि आज की सबसे बड़ी खबर कल कोई याद न रखे।

लेकिन एक पत्रकार की विश्वसनीयता वर्षों तक उसके साथ रहती है।

समाचार क्षणिक हो सकते हैं।

विश्वसनीयता ही पत्रकार की सबसे बड़ी पहचान होती है।

पत्रकारिता का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि खबर सबसे पहले किसने दिखाई।

बल्कि इस बात से तय होगा कि उसे सबसे अधिक ईमानदारी, जिम्मेदारी और सत्यनिष्ठा के साथ किसने प्रस्तुत किया।